ओल के पौधे डीह पर लहलहाने लगे थे हरे-हरे पत्ते देख रहे थे चारों तरफ छोटी-छोटी अँगुल भर की गाँठ लगाई थी थोड़ी -थोड़ी दूर पर यही कोई साल-दो-साल पहले और आज तीन-चार किलो का बड़ा ओल निकाला गया था एक गाँठ कितनी बड़ी हो गयी बढ़कर धीरे-धीरे ठीक इसी तरह बहुत पहले मन पर अकेलेपन की एक छोटी गांठ पड़ी थी माँ आँचल पकड़ पीछे चलते हुए ******************
यह ब्लॉग बस ज़हन में जो आ जाए उसे निकाल बाहर करने के लिए है .कोई 'गंभीर विमर्श ','सार्थक बहस 'के लिए नहीं क्योंकि 'हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ..'
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