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आलम ख़ुर्शीद की ग़ज़लें

आलम ख़ुर्शीद               ग़ज़लें                 1 याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बाद चाँद ने ये मुझ से पूछा रात ढल जाने के बाद मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यूँ देखता हूँ आसमाँ ये ख़्याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद दोस्तों के साथ चलने में भी ख़तरे हैं हज़ार भूल जाता हूं हमेशा मैं संभल जाने के बाद अब ज़रा सा फ़ासला रख कर जलाता हूँ चराग़ तज्रबा   हाथ आया हाथ जल जाने के बाद एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम भेद यह मुझ पर खुला रस्ता बदल जाने के बाद वहशते दिल को बियाबाँ से तअल्लुक   है अजीब कोई घर लौटा नहीं , घर से निकल जाने के बाद              ***               2 हम पंछी हैं जी बहलाने आया करते हैं अक्सर मेरे ख़्वाब मुझे समझाया करते हैं तुम क्यूँ उनकी याद में बैठे रोते रहते हो आने-जाने वाले , आते-जाते रहते है...

किरण कुमारी ‘किरन’ की नज़्में

  किरण कुमारी ‘किरन’ आज फिर ख़्वाब के आँगन में... आज फिर ख़्वाब के आँगन में उतर आया है दिल जब के मालूम है के दूर तलक कोई नहीं फिर से माज़ी की वो यादें हैं यूँ देतीं दस्तक जैसे लगता है के फिर कोई यहाँ आएगा फिर से लगता है के आहट है कोई आने की ऐसा लगता है के एहसास ने पहना है लिबास फिर से हसरत ने करवटें ली हैं फिर से जागा है हसीं कोई धुँधलका एहसास जब के ये वहम है खोई सी इन आँखों का वहम महज़ माज़ी की हसीं याद उभर आई है जब हक़ीक़त है ये के दूर तलक कोई नहीं और ये तय है के अब कोई नहीं आएगा     ***     फ़ासले फ़ासलों का है मेरे लिए कुछ सबब फ़ासलों से ही कितने हैं रिश्ते बने जो क़रीब आ गए वो ही दूर हो गए दिल में रहते हैं कितने ही शिकवे गिले ज़र्ब अपनों ने दिल पे इतने दिए सारे रिश्ते ही लगते हैं अब मसनुई अब तो मिलते हैं यूँ ऐसा लगता है के जैसे रस्में निभाने को हम हैं मिले अब ख़ुलूसो-मुहब्बत कहाँ खो गए अब वो रिश्तों की गर्मी कहाँ चल पड़ी इश्क़ो-जज़्बात का इस नए दौर में अब तो कोई भी मतलब नही...

साहिर लुधियानवी की दो नज़्में मेरी पसंद की – संजय कुमार कुन्दन

साहिर लुधियानवी की दो नज़्में मेरी पसंद की – संजय कुमार कुन्दन मेरे कॉलिज के ज़माने की दोस्त है साहिर की शायरी . एक ज़माना था जब   मुझे साहिर लुधियानवी की नज्में और ग़ज़लें मुँहज़बानी याद थीं. वक़्त बीतने के साथ आज साहिर के कलाम मेरे ज़हन के पसमंज़र में एकदम ज़िंदा-जावेद हैं लेकिन ज़ुबान तक लाने के लिए बीच बीच में मुझे उसकी किताबों का सहारा लेना पड़ जाता है. यह नहीं के महज़ उसकी ग़ज़लो और नज़्मों की रूमानियत मुझे अपनी ओर खींचती है या के उसके कलाम का एहतजाज़ी तेवर. उसने जिस नैचुरल अन्दाज़ में अपने   एहसासात को पेश किया है वह एक मुकम्मिल शायरी बन गई है बिना किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती के- “दुनिया ने तजरबात-ओ-हवादिस की शक्ल में/ जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं.” और कोई भी हस्सास आदमी इस रिटर्न गिफ्ट को बड़ा सहेज कर रखेगा. आज ‘होता है शबो-रोज़...’ में उसकी दो नज़्मों को एह्तारामन पेश कर रहा हूँ बिना उसके कलाम के तजज़िया के क्योंकि मुझमें वो अदबी सलाहियत नहीं के मैं साहिर के कलाम का तजज़िया कर सकूँ. मादाम आप बे - वज्ह परेशान सी क्यूँ हैं मादाम लोग कहते हैं तो ...