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कबीर श्रीवास्तव की कविताएँ

  हमराही कबीर श्रीवास्तव  चुप हूं मैं काली लंबी सड़कों पर रगड़ खाती हुई कभी पथरीली कभी लोहे- सी कभी आग - सी धधकती सड़कों पर घिसटती किसी की हिम्मत संग कुछ सख्त कुछ कोमल पांव की रक्षा को अंत तक संघर्ष करती हुई मैं दाब और गति से महसूस की है हताशा निराशा भय जिजीविषा ठोकर भरी राह में कई बार टूटी फिर जुड़ी मैं पराए धागों से आगे से दो कीलें भी निकल आयी हैं उफ्फ ! चुभने लगी हैं पैरों में फिर पत्थरों की चोट खा मन ही मन मुस्कायी मैं नन्हे सपनों संग कुछ दिन पहले ही तो अाई थी हजारों मील नाप चुकी हूं उन सपनों को गिरते घिसटते देखा है हजारों मील बाद भी वो घिसट रहा है और मैं भी साथ चुपचाप घिसट रही हूं अंत की प्रतीक्षा में     ***   ये किसकी लाशें हैं? रेल की पटरियों पर कुछ अगल - बगल में क्षत- विक्षत ये किसकी लाशें हैं?   अरे ! ये क्या इनके शरीर की बोटियों के बीच ये सूखी रोटियां टुकड़े - टुकड़े होकर बिखर चुकी रोटियां खुली हुई कुछ गठरियां ट...

विक्रांत की कविताएँ

  विक्रांत की कविताएँ  विक्रांत 1 गहरा घुप्प गहरा कुआं जिसके ठीक नीचे बहती है एक धंसती - उखड़ती नदी जिसपे जमी हुई है त्रिभुजाकार नीली जलकुंभियाँ उसके पठारनुमा सफ़ेद गोलपत्तों के ठीक नीचे पड़ी हैं , सैंकड़ों पुरातनपंथी मानव - अस्थियाँ मृत्तक कबीलों का इतिहास जिसमें कोई लगाना नहीं चाहता डुबकी छू आता हूँ , उसका पृष्ठ जहाँ तैरती रहती है निषिद्धपरछाइयाँ प्रतिबिम्ब चित्र चरित्र आवाज़ें मानवीय अभिशाप ईश्वरीय दंड जिसके स्पर्शमात्र से स्वप्नदोषग्रस्त आहत विक्षिप्त खंडित घृणित अपने आपसे ही कहा नहीं जा सकता सुना नहीं जा सकता भूलाता हूँ , सब बिनस्वीकारे सोचता हूँ रैदास सा कि गंगा साथ देगी चुटकी बजा बदलता हूँ , दृष्टांत।     *** 2 मेरे दोनों हाथ अब घोंघा - कछुआ हैं पर मेरा मन अब भी सांप हृदय अब भी ऑक्टोपस आँखें अब भी गिद्ध। मेरुदंड में तरलता लिए मुँह सील करवा किसी मौनी जैन की तरह मैं लेटा हुआ हूँ लंबी - लंबी नुकीली , रेतीली घास के बीच एक चबूतरे पे पांव के पास रख...