हमराही कबीर श्रीवास्तव चुप हूं मैं काली लंबी सड़कों पर रगड़ खाती हुई कभी पथरीली कभी लोहे- सी कभी आग - सी धधकती सड़कों पर घिसटती किसी की हिम्मत संग कुछ सख्त कुछ कोमल पांव की रक्षा को अंत तक संघर्ष करती हुई मैं दाब और गति से महसूस की है हताशा निराशा भय जिजीविषा ठोकर भरी राह में कई बार टूटी फिर जुड़ी मैं पराए धागों से आगे से दो कीलें भी निकल आयी हैं उफ्फ ! चुभने लगी हैं पैरों में फिर पत्थरों की चोट खा मन ही मन मुस्कायी मैं नन्हे सपनों संग कुछ दिन पहले ही तो अाई थी हजारों मील नाप चुकी हूं उन सपनों को गिरते घिसटते देखा है हजारों मील बाद भी वो घिसट रहा है और मैं भी साथ चुपचाप घिसट रही हूं अंत की प्रतीक्षा में *** ये किसकी लाशें हैं? रेल की पटरियों पर कुछ अगल - बगल में क्षत- विक्षत ये किसकी लाशें हैं? अरे ! ये क्या इनके शरीर की बोटियों के बीच ये सूखी रोटियां टुकड़े - टुकड़े होकर बिखर चुकी रोटियां खुली हुई कुछ गठरियां ट...
यह ब्लॉग बस ज़हन में जो आ जाए उसे निकाल बाहर करने के लिए है .कोई 'गंभीर विमर्श ','सार्थक बहस 'के लिए नहीं क्योंकि 'हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ..'