ओल के पौधे डीह पर
लहलहाने लगे थे
हरे-हरे पत्ते देख रहे थे
चारों तरफ
छोटी-छोटी अँगुल भर की गाँठ
लगाई थी थोड़ी -थोड़ी दूर पर
यही कोई साल-दो-साल पहले
और आज
तीन-चार किलो का बड़ा ओल
निकाला गया था
एक गाँठ कितनी बड़ी हो गयी
बढ़कर धीरे-धीरे
ठीक इसी तरह
बहुत पहले मन पर
अकेलेपन की
एक छोटी गांठ पड़ी थी
माँ आँचल पकड़
पीछे चलते हुए
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aap har nayi subeh ki tareh purani yaadon ko naya kar deti hain.
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