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बात करनी हमें मुश्किल कभी ऐसी तो न थी .....


तबीयत हो रही है के अपनी घबडाई हुई तबीयत पर कुछ लिखूं .लेकिन क्या लिखूं समझ में नहीं आ रहा .आजकल नैशनल और इंटरनैशनल मार्केट में फल ,सब्जी,किताब ,अनाज नहीं बिकते jargon बिकते हैं.शब्दकोष  में jargon के मायने जो भी हों -यह एक विशेष बिकाऊ और अचंभित कर देने वाली शब्दावली ज़रूर है.यह दरअसल भाषा और व्यक्तित्व का special effects है.सरकारी विश्व का अपना jargon  है और कोर्पोरेट जगत का अपना  jargon ."अधोहस्ताक्षरी " ,"घटनोत्तर स्वीकृति","भवदीय अनुमोदन " सरकारी जारगन हैं जबकि TOT (training of trainers),MOM(minutes of meeting),KT(knowledge transfer),mood,aspect इत्यादि कोर्पोरेट जारगन .
एक आम आदमी इन जारगंस के बीच में ज़बरदस्त ढंग से फंसा है .फिर न्याय का अपना जारगन है और इंसाफ़ का अपना जारगन.आम आदमी सिवाय चौंकने के कुछ भी नहीं कर सकता. वह बेवकूफ़ सिर्फ़ बोलचाल की भाषा का सहारा लेता है .बाप को बहुत हुआ तो पापा या डैडी बोल लेता है .बाप को इस जार्गन के जगत में CPGF भी कहा जा सकता है --Centre of Power in a Group of Persons.सरकारी कर्मचारी  और पदाधिकारी इन्हीं जार्गन को ईंटों में परिभाषित कर बड़े-बड़े मकान ठोक लेते हैं.आम आदमी की सारी इच्छाएं "विलोपित " हो जाती हैं और वे सब अपने सारे कुकृत्यों की " घटनोत्तर स्वीकृति" प्राप्त कर लेते हैं.
उधर कोर्पोरेट जगत में के जार्गन युवा वर्ग की सारी इच्छाओं के गुड मीडियम बनते  हैं .जार्गन पर जितनी  ज़्यादा  पकड़ उतनी ही सुविधाओं का उपभोग .इन्हीं जार्गन को सरकारी दफ्तरों में बेचने के लिए नियमित हवाई यात्राएं और महंगे होटलों में ठहरने का सुख मिलता है.एक गंभीर अध्ययन वाला विद्यार्थी अगर इन जार्गन का एक्सपर्ट नहीं बने तो कॉर्पोरेट जगत उसके मुंह पर no entry की तख्ती मार देगा .
चूंकि आज की दुनिया में आम कुछ नहीं रहा सब ख़ास हो गया है इसलिए मारिये गोली आम आदमी को और बनिए जार्गन का एक्सपर्ट ,नहीं बन पाए तो ख़स्ताहाल रहिए और ज़फ़र के शेर पर तशफ्फी कीजिये के :---
"बात करनी हमें मुश्किल कभी ऐसी तो न थी /
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी /"
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