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ग़ज़ल 

 सुना,हवा के ज़ीने से वो माहताब उतर गया 
अगर ये मोजज़ा ही था तो दिल में रंग भर गया

उदासियों के दौर में जवाँ थीं मुस्कराहटें
जो दौरे -क़हक़हा चला तो मुझको तल्ख़ कर गया

वो सादा-सादा मंज़रों में रंग भरनेवाला था 
सुना है,ख़ुशबुओं- सा वो गली-गली बिखर गया

वो खुद में जज़्ब इस क़दर के रंग पत्तियों में जज़्ब 
वो होशमंद बज़्म से ख़ुशी से बेख़बर गया

मुझे ज़रा-सी बात का गिला रहा था उम्रभर
तमाम मेरी ग़लतियाँ वो भूलता गुज़र गया

परी कोई हो नन्हीं -सी सफ़ेद-से लिबास में 
ये लम्स ताज़ा सुब्ह का असर कुछ ऐसा कर गया

उतारा एक पैरहन तो ग़मज़दा हुए सभी 
के 'कुंदन'आज भी तो है, वो कह रहे हैं मर गया

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