24.08.1992 की एक ग़ज़ल
हैं चश्मे-पुरनम हम-तुम
प्यासे हैं हरदम हम-तुम
धूप कड़ी हालातों की
मानिन्दे-शबनम हम-तुम
दिल से ज़हन तलक आये
मिलते हैं अब कम हम-तुम
एक ही जज़्बा,एक ही लफ़्ज़
बोल उठे यकदम हम-तुम
यादें कश्ती ,शब् दरिया
डूबते हैं पैहम हम-तुम
कौन किसे समझाएगा
अबके हैं बरहम हम-तुम
"कुंदन" एक ही लम्हे में
कितने थे मौसम हम-तुम
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