सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं


ग़ज़ल

b
तनहा चले ,उदास चले ,बेनिशाँ  चले 
बेहतर है ज़िन्दगी वही जो रायगाँ चले 

हमने तो महफ़िलों का बहुत ज़ायक़ा लिया 
अब ये न पूछ हमसे के उठकर कहाँ चले 

हाथों पे अपने हमने संभाले कई तूफाँ 
टूटी हुई कश्ती पे कहाँ बादबाँ  चले 

कल ख़ामुशी से एक जनाज़ा उठा यहाँ 
सब शोरोग़ुल में जश्न के लेने अमाँ चले 

ये कारोबारे-शौक़ है इसका अजब हिसाब 
इसमें ब-तौरे-सूद तो ख़ालिस ज़ियाँ चले 

इस बस्ती -ए -शोहरत की रवायत है आजतक 
हँसते हुए जो आये थे  गिरियाकुनां   चले 

'कुंदन' फ़क़ीरे -शह्र ने कैसी थी दी सदा 
हम बे-सरो-सामान ही पहुँचे जहाँ चले 

*************************

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अँगुल भर की गाँठ

ओल के पौधे डीह पर  लहलहाने लगे थे  हरे-हरे पत्ते देख रहे थे  चारों तरफ  छोटी-छोटी अँगुल भर की गाँठ  लगाई थी थोड़ी -थोड़ी दूर पर  यही कोई साल-दो-साल पहले  और आज  तीन-चार किलो का बड़ा ओल  निकाला गया था  एक गाँठ कितनी बड़ी हो गयी  बढ़कर धीरे-धीरे  ठीक इसी तरह  बहुत पहले मन पर  अकेलेपन की  एक छोटी गांठ पड़ी थी  माँ आँचल पकड़  पीछे चलते  हुए    ******************

कमलेश की कहानी-- प्रेम अगिन में

  कमलेश            प्रेम अगिन में   टन-टन-टन। घंटी की आवाज से तंद्रा टूटी छोटन तिवारी की। बाप रे। शाम में मंदिर में आरती शुरू हो गई और उन्हें पता भी नहीं चला। तीन घंटे कैसे कट गये। अब तो दोनों जगह मार पड़ने की पूरी आशंका। गुरुजी पहले तो घर पर बतायेंगे कि छोटन तिवारी दोपहर के बाद मंदिर आये ही नहीं। मतलब घर पहुंचते ही बाबूजी का पहला सवाल- दोपहर के बाद मंदिर से कहां गायब हो गया ? इसके बाद जो भी हाथ में मिलेगा उससे जमकर थुराई। फिर कल जब वह मंदिर पहुंचेंगे तो गुरुजी कुटम्मस करेंगे। कोई बात नहीं। मार खायेंगे तो खायेंगे लेकिन आज का आनन्द हाथ से कैसे जाने देते। एक बजे वह यहां आये थे और शाम के चार बज गये। लेकिन लग यही रहा था कि वह थोड़ी ही देर पहले तो आये थे। वह तो मानो दूसरे ही लोक में थे। पंचायत भवन की खिड़की के उस पार का दृश्य देखने के लिए तो उन्होंने कितने दिन इंतजार किया। पूरे खरमास एक-एक दिन गिना। लगन आया तो लगा जैसे उनकी ही शादी होने वाली हो। इसे ऐसे ही कैसे छोड़ देते। पंचायत भवन में ही ठहरती है गांव आने वाली कोई भी बारात और इसी...

यतीश कुमार की कविताएँ

  यतीश कुमार देह , बाज़ार और रोशनी - 1 घर के कोने में धूप   कुछ धुँधली सी पड़ रही है   रंगीन लिबास में   मुस्कुराहट   नक़ाब ओढ़े घूम रही है     उस गली में पहुँचते ही वसंत पीला से गुलाबी हो जाता है इंद्रधनुषी सतरंगी किरणें उदास एकरंगी हो जाती हैं   वहाँ से गुज़रती हवा थोड़ी-सी नमदार थोड़ी-सी शुष्क   नमक से लदी भारीपन के साथ हर जगह पसर जाती है हवा में सिर्फ़ देह का पसीना तैरता है     दर्द और उबासी में घुलती हँसी   ख़ूब ज़ोर से ठहाके मारती है     सब रूप बदल कर   मिलतेहैं वहाँ   सिर्फ मिट्टी जानती है बदन पिघलने का सोंधापन और बर्दाश्त कर लेती है पसीने की दुर्गन्ध     मिट्टियों के ढूह पर बालू से घर बनाता है   एक आठ साल का बच्चा और ठीक उसी समय एक बारह साल की लड़की कुछ अश्लील पन्नों को फाड़ती है और लिखती है आज़ादी के गीत पंद्रह अगस्त को बीते   अभी कुछ दिन ही हुए हैं         ***...