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ग़ज़ल 

अपनी गवाही ख़ुद ही देना ,अपना हाल सुनाना क्या 
जो हैं अपनी राय पे क़ायम ऐसों को समझाना  क्या 

छोटी-छोटी ख़्वाहिश लेकर यूँ ख़ुद को भरमाना क्या 
हम जैसों का इस दुनिया में जीना क्या ,मर जाना क्या 

दिल के सहरा और लम्हों के कोहे-गिराँ को देखे कौन 
मजनूँ और फ़रहाद के आगे अपना भी अफ़साना क्या 

 रात सिसकती रहती है जब बिस्तर के इक कोने पर 
दिन का महफ़िल-महफ़िल जाकर हँसना और हँसाना क्या   

जज़्बों की तारीख़ यही है दरिया ने रुख़ बदला है 
लेकिन प्यासी रूह का क़िस्सा बार-बार दुहराना क्या 

सब अपनी दूकान सजाए बैठे हैं इस मेले में 
अपनी जिन्स का भाव बताने में ऐसा शरमाना क्या 

दर्द को देकर ये पैराहन , ग़म को देकर एक रिदा 
'कुंदन' इन नग़मों की तह में अपना ज़ख्म छुपाना क्या 

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