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   ग़ज़ल


सारे  भरम ज़िन्दा उसमें
तुम और हम ज़िन्दा उसमें

वो  साया  हमदोनों  का
सारे क़सम ज़िन्दा उसमें

ख़ुशियाँ फ़ना हुईं  हमसे
रंजो-अलम ज़िन्दा उसमें

याद के पिंजरे में  लम्हे
बिछड़ा ग़म ज़िन्दा उसमें

मौसम  सारे  कुम्हलाए
इक मौसम ज़िन्दा उसमें

ख़ुश न हुए हम इक लम्हा
कौन सा ग़म ज़िन्दा उसमें

काबा-ए-दिल कैसा 'कुन्दन'
सारे  सनम  ज़िन्दा  उसमें

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