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       ग़ज़ल


 अजब  एहसास से  आरी  है दुनिया
मगर फिर भी बहुत प्यारी है दुनिया

नहीं छोड़ेगी जब तक सांस बाक़ी
हमारी  जान  पे  भारी  है दुनिया

कभी सिमटे किसी इक शख़्स में  ये
कभी  अफ़लाक  पे  तारी  है दुनिया

सिकंदर  की  कभी  महबूब  है   ये 
कभी  मजनूँ  की बेज़ारी है दुनिया

निकल जाओ सलीक़े से  यहाँ से
इसी नुक़्ते की तैय्यारी है दुनिया

यही सच है तवील इक नींद में है
गुमाँ ये है  के  बेदारी है  दुनिया

तेरी दुनिया की  मजबूरी है  'कुन्दन'
और इस शायर की लाचारी है दुनिया


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