अपने ब्लॉग पर आए हुए एक ज़माना हुआ. ऐसा लगा,
जैसे आप अपनी किसी अज़ीज़ चीज़ को कहीं रख कर भूल जाते हों, जैसे कोई तस्वीर, कोई
फूल, किसी काग़ज़ के एक छोटे से पुर्ज़े पर लिखी कोई इबारत या बाज़ दफ़ा तो अपनी
शख्सियत ही.
लेकिन अब फिर से मैं ‘होता है शबो-रोज़ ...’
की दास्ताँ फिर से दर्ज़ करना चाह रहा हूँ. न सिर्फ़ अपनी बात बल्कि सारे ज़माने की
बात. न सिर्फ़ अपना लिखा बल्कि और मुझसे कहीं बेहतर लोगों का भी लिखा, न सिर्फ़ एक
मौज़ू बल्कि अनगिनत मौज़ूआत.
क्योंकि शबो-रोज़ जो तमाशा मेरे आगे हो रहा
है, वह हर किसी के साथ हो रहा है, इसलिए इस ब्लॉग को पढ़ने वाले मेरे दोस्तों थोड़ा
सा और इंतज़ार करें और मैं आप सारे लोगों से आपकी दिलचस्पियों के साथ इस ब्लॉग के ज़रिए साझा करूँगा ज़माने के तजर्बात.
आज के लिए बस थोड़ा इंतज़ार की दावत.
संजय कुमार कुन्दन
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