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ग़ज़ल  हम उसके शह्र में कितने फ़साने छोड़ आए  ये एहतियात भी बरती न उसका नाम आए ख़िरद का ही रहा इलज़ाम उम्र भर हम पर  ये और बात के हम थे जुनूँ  के बहकाए   हमारी तनहारवी ने   ये हर घड़ी पूछा  भला वो कौन सी महफ़िल थी जिसको छोड़ आए  वो दौर था के ख़यालों में इक रवानी थी   अभी तो चाह कर आगे न बात बढ़ पाए  हमारा कौन मुखालिफ़ है इससे क्या मतलब  हम अपने हो भी सके हैं ,कोई ये बतलाए    रात की राह पे पसरी थी इस क़दर चुप्पी  के कोई ख़्वाब भी टूटे तो शोर मच जाए  हम अपने अहद को 'कुंदन' समझनेवाले थे  ख़राबे-ख़ाना भी रहकर कभी न पछताए    ***************************
ग़ज़ल   जो अहले-ख़्वाब थे वो एक पल न सो पाए  भटकते ही  रहे शब् भर  ये  नींद  के साए  एक मासूम-सा चेहरा था, खो गया शायद हमें भी ज़ीस्त ने कितने नक़ाब  पहनाये  वो सुन न पाया अगरचे सदायें हमने दीं   न पाया  देख हमें  गरचे सामने आये  गुज़रना था उसे सो एक पल ठहर न सका  वो वक़्त था के मुसाफ़िर न हम समझ पाए    हमें न पूछिए मतलब है ज़िंदगी का क्या  सुलझ चुकी है जो गुत्थी तो कौन उलझाए  हमारी ज़ात पे आवारगी थी यूं क़ाबिज़  कहीं पे एक भी लम्हा न हम ठहर पाए बस एक  बात का 'कुंदन'बड़ा मलाल रहा  के पास बैठे रहे और न हम क़रीब  आये   ****************************
ग़ज़ल  किसे ख़बर थी के  जो लोग दरम्याँ होंगे  यक़ीने- ज़ात की ख़ातिर वो इम्तहाँ होंगे   ज़मीं पे रेंग के काटी थी उम्र इस दम पर   आसमाँवाले कभी  उनपे  मेहरबाँ  होंगे   सुखन का हाल भी कुछ अपने लहू-सा होगा  बहे जो बेसबब अशआर रायगाँ   होंगे    वो जिनपे  जान  लुटाने का हौसला बांधा  ये बात तय है के वो ही उदू -ए -जाँ  होंगे  हुजूमे-कारवां में खो गए वो लोग  यहाँ  जिनपे इमकान था के मीरे-कारवां  होंगे   वो जिनके होठों पे होती नहीं है  जुम्बिश भी  वो लोग तय है ,समंदर से बेकराँ   होंगे   क्या यही सोच के शिद्दत को छोड़ दे 'कुंदन' ज़लील होना है लेकिन कहाँ -कहाँ होंगे  **************************
रतजगा कोई नयी बात नहीं   रतजगा कोई नयी बात नहीं मुझसे पहले भी तो  ये सानेहा गुज़रा ही है नींद के कितने सिपाही यहाँ हलाक हुए  शब् के इस हौलनाक मैदाँ में    कितनी ही आँखों में कांटे उभरे  कितने ख़्वाबों का आसरा टूटा  और सन्नाटों में गुज़रे लम्हे  और पलकों ने मुहज्ज़ब दूरी   नींद से क़ायम रक्खी  हादसे होते हैं  पर हादसा ये आम नहीं  फ़तह तो नींद की होती है  शब् के मैदाँ में  रात के सीने पे होता है  नींद का परचम  पर कभी ऐसा भी होता ही है  नींद आँखों से लिए कोई  चला जाता है  और फिर ख़्वाब के पनाहगुजीं रात के बेअमाँ ठिकानों में  कू-ब-कू ,बेसबब भटकते हैं  और फिर ये भी एक सच ही है  रतजगा कोई नयी बात नहीं   *********************      
रंगे-तिलिस्म  ज़रा दस्तार उछालो  ज़रा-सा तख़्त उलटो जो के सदियों से है मज़लूम उस रिआया को  चंद लम्हों का वहम  हो के  बेड़ियाँ टूटीं  जो उसके पानी को  रोका गया था  बह निकला  न जाने कब से थी महरूम  निवालों से जो  सारे गल्लों  के क़ुफ्ल टूट गए  चंद लम्हों का वहम हो उसको  लेकिन उछला है क्या दस्तार कभी  क्या हमेशा के लिए  तख़्त को उलटा है गया  तख्तो-दस्तार के हज़ारों रंग  और ये रंग बदलनेवाले काश ,मज़लूम रिआया  ये समझ ले इक दिन   और उस रंग पे क़ब्ज़ा कर ले  जिसमें के जज़्ब है सदियों का ग़ुरूर काश दस्तार उछाले ,न तख़्त को उलटे  तोड़ डाले वही तिलिस्मी रंग  जो के पेवस्त है  हर हुक्मराँ की आँखों में  ********************** 
05.10.2002  की एक ग़ज़ल  हम भी काम के शख्श हैं इससे उसको कुछ इनकार भी है  लेकिन उसके दिल में छुपी इक नफ़रत की तलवार  भी है  सर को झुकाना शौक है उसका,सर को कटाना ज़िद अपनी दुनिया का बाज़ार है जिसमें तख़्त भी है और दार  भी है   स्याह  अन्धेरा  वक़्त है जिसमें जुगनू सा इक लम्हा  है   और वो  जुगनू  है कैसा  जो उड़ने को तैयार  भी  है  इक पागल को अपनाना  भी ख़ुद है इक दीवानापन  गर ये बात समझता है पर वो ख़ुद से लाचार भी है  कौन करेगा मेरी वकालत ,कौन मेरा शाहिद होगा  सब हैं अपनी दौड़ में शामिल वक़्त की इक रफ़्तार भी है  लहर-लहर उलझाव बहुत है,साहिल का भी वादा है  हर कोई इस बात को भूला कोई दरिया पार भी है  माफ़ करो, वो जाता है अब कैसे भी वो रह लेगा  शह्र में तेरे अब 'कुंदन' की क्या कोई दरकार भी है   *********************************
24.08.1992 की एक ग़ज़ल  हैं  चश्मे-पुरनम   हम-तुम  प्यासे हैं हरदम   हम-तुम  धूप  कड़ी   हालातों    की  मानिन्दे-शबनम   हम-तुम    दिल से ज़हन  तलक आये  मिलते हैं अब कम  हम-तुम    एक ही जज़्बा,एक ही लफ़्ज़   बोल उठे यकदम  हम-तुम  यादें कश्ती ,शब्  दरिया  डूबते हैं पैहम हम-तुम   कौन किसे समझाएगा  अबके हैं बरहम हम-तुम  "कुंदन" एक ही लम्हे में  कितने थे मौसम हम-तुम  *********************