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ग़ज़ल  ख़ुद से मिलते हैं कभी ख़ुद को भूल जाते हैं  हमपे वाजिब भी नहीं नाज़ वो उठाते हैं लाख हँसते हों मगर हैं तो ख़स्ताहाल ही हम  सब पे ज़ाहिर हैं मगर इक ज़रा छुपाते हैं अब अकेले में भी करते हैं क्या इसे छोड़ो  सामने सबके हमेशा ही मुस्कराते हैं झूठ भी कहते हुए वो न लरज़ता है ज़रा  सच भी कहते हुए ये होठ थरथराते हैं सामना करते हैं दिन-रात हक़ीक़त का हम  और इक लम्से-तसव्वुर से बिखर जाते हैं आँख के बदले है कानों पे भरोसा इतना  जो भी सुनते हैं वही सबको ये सुनाते हैं लगी है आग जो दिल में उसे भी क्या देखें  शिकम की आग ही 'कुंदन' यहाँ बुझाते हैं     *******************
ग़ज़ल  रात आँखों  में  ही गुज़ारी  है  और हर लम्हा दिन का भारी है  सर झुकाता नहीं है, हैरत है  कोई नश्शा तो उसपे तारी है  मेरे अलफ़ाज़ थे नदामत के  उसने समझा के इन्कसारी है  ध्यान आया है आख़िरी पल में  जीत कर हमने जंग हारी  है  ख़ुद से छुप के मिलें हैं जिस लम्हा  हमने लम्हे में उम्र उतारी है  पत्थरों पे फिसलता हो पानी  वैसे ही दिल पे शेर तारी  है  इक सलीक़े का शेर हो 'कुन्दन ' बस  यही  एक  बेक़रारी   है  ***********************
ग़ज़ल   ज़िन्दगी अस्ल  में ज़रुरत हो  माफ़ करना कहा मुसीबत हो  कल हो याके हो आज का ये दिन  तुम हमेशा से इक क़यामत हो  पर कहाँ जाऊं छोड़कर तुमको  दश्त में घर की इक शबाहत हो  गुलमोहर तुमसे है तरग़ीबे- सुख़न  मेरे अशआर की  हरारत  हो  तुम तो दिल तोड़ने में माहिर हो  इक ज़रा मुझसे भी शरारत हो  मैंने माना सफ़र है सख्त बहुत  रास्तों में तो कुछ नज़ाक़त हो  सच से लगता है  खौफ़ ऐ 'कुंदन' और मुजस्सम ही तुम सदाक़त हो *********************
ग़ज़ल  क्या जाने किन ख़लाओं की मैं चाहतों में हूँ  महदूद इलाक़ा है  मगर  वुसअतों  में  हूँ जब तक था उसके पहरे में आज़ाद बहुत था  जब  से  उठाए  पहरे  बहुत बंधनों  में  हूँ सरगर्मियाँ हयात की हर लम्हा गामज़न  हर लम्हा अपनी ज़ात की तनहाइयों में हूँ आओगे जब क़रीब तो घबड़ा के होगे दूर  इक जज़्बा-ए-बेनाम की मैं शिद्दतों में हूँ दुहरा रहा हूँ ख़ुद को हरइक लम्हा ख़ामख़्वाह  अक्स और आईने की ग़ज़ब ग़फ़लतों में हूँ कोई हटाए सर से मेरे बोझ तो समझूं  चेहरा नहीं हूँ , भीड़ के इन पैकरों में हूँ 'कुंदन' हज़ार नींद की तकमील बस इक नींद  किस क़िस्सा-ए-बेदार के  ज़ुल्मतकदे  में  हूँ *************
ग़ज़ल  ये  आज  हो  गया है ज़रा रतजगा तो क्या  और इक तवील नींद का है आसरा तो क्या वो पल था  फ़ासलों पे  चढ़े क़ुर्बतों   के  रंग  अब दूरियों ने याद को धुँधला दिया तो क्या  अब  अपने  इस बिखराव पे  रोऊँ  के  हँसूँ  मैं  अपनी हिफ़ाज़तों में वो यकजा हुआ तो  क्या  मिलने को उसको  वैसे  हरेक शै  है  मयस्सर  जो चाहिए था उसके सिवा सब मिला तो क्या   वो  मुतमइन  कभी  न  था  बिखराव से   मेरे  ये आज उसने कह ही दिया बरमला तो  क्या  वो  तामियाद   साँस  के  ज़िन्दाँ   में  क़ैद  है  चोटों के तसलसुल से ज़रा थक गया तो क्या  'कुंदन'  कहीं  पे  मुन्तज़िर   होगी  बहार  भी  ताउम्र  गरचे  बाग़  ये  उजड़ा  रहा  तो  क्या  **************************** ...
(1981 की एक नज़्म ) तनाबें* तोड़ दो ... मैं मुतरिब (1)नहीं हूँ फ़क़त मुफ़लिसों का  मैं शायर हूँ इन फ़लसफ़ों में न  बाँधो  मैं फ़ितरत के हर रंग का हूँ मुसव्विर(2) न मुझको फ़क़त जंग की सुर्ख़ियाँ  दो  क़लम है मेरा मुन्तज़िर (3)  वुसअतओं (4)का  धनक (5 ) के हसीं  सात  रंगों  के  आगे  हो बेशक हक़ायक़ के इसमें मनाज़िर (6) दरीचे तख़य्युल (7) के भी ये उठा  दे  अगर  बेकसों  का  अलमदार  बनकर  मेरे नग़में ज़ुल्मो-सितम को मिटा  दें  तो महलों में सादिक़(8)कोई जज़्बा पनपे  उसे भी ज़माने को बढ़कर बता दें  सुख़न(9)पे नहीं सिर्फ़ इन्साँ का हक़ है  शजर(1 0 )और पत्तों की भी गुफ़्तगू है  हवा बात करती है,गाते हैं बादल  लरज़ते-थिरकते ये जामो-सुबू  हैं  बिलकते हुए तिफ़्ल(1 1 ) हैं मुफ़लिसों के  तो गुल(12)हैं लताफ़त(13)के पाले हुए भी  है लफ़्ज़ों की ज़द में अगर बाग़े-जन्नत  तो इन्साँ हैं वाँ(14)...
ग़ज़ल  चारदीवारी के अन्दर भी फ़र्क़ बहुत ही आया है  इक कमरे में मैं रहता हूँ,इक में मेरा साया है  आज अकेला  बैठा हूँ मैं   अपने  वीराँ कमरे में  धुँधली-धुँधली यादों ने बस अपना साथ निभाया है  मिलने-जुलने का हंगामा,प्यार-मुहब्बत की बातें  माना तुम मसरूफ़ हो लेकिन अपना ये सरमाया है  वाक़िफ़ है बाज़ार के वो आदाब से कुछ इतना ज़्यादा  दूकाँ-  दूकाँ खोटा सिक्का उसने ख़ूब  भुनाया  है  हम जैसों पे कौन सितम ढाएगा,कितना ढाएगा  किश्तों में जब हमने अपना ख़ुद ही लहू बहाया है   बनते-बनते बात बिगड़ने की जैसे इक रस्म है ये रस्मों के पाबन्द रहे हैं,ख़ुद ये रोग लगाया  है  हमने भी 'कुंदन'पहाड़ से दिन को काटा है पल-पल  उसने भी कुछ आँसू देकर अपना फ़र्ज़ निभाया है  **************************