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बस यूं ही



मन है तो बेचैन होगा.इसका उलट यह भी हो सकता है के मन है तो शांत भी होगा .
शायरों और हयावालों का मन तो बेचैन होगा ही और संन्यासियों और बेशर्मों का 
मन शांत होगा ही .मेरा मन थोड़ा बेचैन है --संन्यासी  तो नहीं हूँ लेकिनशायर हूँ के
 नहीं यह तो पढ़नेवाले तै करेंगे और हया के बारे में इतना ही कहना है के 'मैं आस-पास 
के लोगों- सा हो नहीं सकता/अभी भी आँख में लगता है कुछ तो पानी है /'
अब ये नहीं पूछिए के बक-बक क्यों कर रहा हूँ .क्योंकि मुझे बेसबब कुछ कहने ,कुछ करने में  मज़ा 
आता है.सार्थक बहसों में मैं बहुत यक़ीन नहीं करता .हिंदी के एक बड़े कवि मुझे non 
-serious समझते थे और मुझे उनके इस निहायत गंभीर approach पर बड़ा मज़ा 
आता था .जब वे अफ्रिका अमेरिका के मसलों पर बात करते थे मैं परवल और कद्दू 
की बात करने लगता था .अब आप इसे जो कहें .मैं बेचैन हूँ और टाइप कर रहा हूँ .
यह और बात के इस बेसबब -सी बात को पोस्ट कर आपको भी बेचैन करूंगा. 
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