आज से सोचा वो करूँ जो पिछले कई दशकों से सोचता आया कि करूँ लेकिन कर नहीं पाया. यानी कि कुछ गद्य लेखन यानी कहानी और उपन्यास को अपने अंजाम तक पहुँचाना. बक़ौल साहिर लुधियानवी अंजाम तक पहुँचा नहीं पानेवाले उन अफ़सानों को ‘ख़ूबसूरत मोड़’ देकर भी छोड़ नहीं पाया या शरतचन्द्र के पिता मोतीलाल की तरह कोई भी रचनात्मक कार्य शुरू करने के बाद बीच में ही छोड़ दिया. हालाँकि मैं उन नाविकों की क़द्र करता हूँ जो बीच दरिया में ही कश्ती डुबोने की जुर्रत करते आए हैं. फिर भी शर्मन-लिहाजन लगता है जीवन भर की इसकाहिली के इतिहास पर एकाध नॉवेल और कहानी-संग्रह पूराकर एक सवालिया निशान छोड़ जाऊँ. अब अपने पक्ष में कोई तर्क पेश करना या कई तरह के बहाने पेश करना भी थोड़ा ठीक नहीं लगता. वैसे चाहूँ तो बहुत सारी शहादतें पेश कर सकता हूँ अपनी बेगुनाही को साबित करने के लिए जैसे कि वक़्त की कमी, ज़िन्दगी भर अपना और अपनों का पेट पालने के लिए किसी न किसी काम में लगा रहना जिसका अदब और सकाफ़त से कोसों दूर का वास्ता नहीं था, फिर जिस्मानी तौर पर थक जाना या माहौल, प्रोज राइटिंग के लिए सही माहौल नहीं मिल पाना, कई वजूहात हैं जो अदब और साहित्य को ...
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