सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
22.11.1985 की एक ग़ज़ल 

जैसे कटी इक और ये शब भी गुज़र गयी 
ये और बात,ख्वाहिशे-ख्वाबे-सहर  गयी 

ऐसी थी बेख़ुदी मेरे दर पर के  ज़िंदगी 
आयी थी होशमंद मगर बेख़बर गयी 

बेख़ुद हुआ जो शौक़ तो उभरे तेरे नुक़ूश
वहशत मुसव्विरी को पशेमान  कर गयी 

एक ग़म था जिसने मुझको सम्भाला है उम्रभर 
इक थी ख़ुशी जो बरमला ग़ैरों के घर  गयी 

नीयत के साफ़ होने की जब भी है दी दलील 
मेरी नज़र मुझे ही पशेमान कर गयी    

अब तीरगी में जा के खुला है ज़िया का राज़
जबके नज़र के साथ ही ताबे-नज़र  गयी  

शाम आयी और मचलने लगे ये मेरे क़दम 
तनहा चले जिधर भी मेरी रहगुज़र गयी 

दिन अजनबी-सा मेरी बग़ल से गुज़र गया 
रात आशना-सी मेरे मकाँ में ठहर गयी 

महरूमियों से प्यार था,क़ुर्बत से इश्क़ भी
इस कशमकश में उम्र मज़े से गुज़र गयी 

'कुंदन' रहे हैं रुसवा  अगरचे तमाम उम्र 
वो भी थी इक घड़ी के बड़ी मोतबर गयी 

**************************  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आलम ख़ुर्शीद की ग़ज़लें

आलम ख़ुर्शीद               ग़ज़लें                 1 याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बाद चाँद ने ये मुझ से पूछा रात ढल जाने के बाद मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यूँ देखता हूँ आसमाँ ये ख़्याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद दोस्तों के साथ चलने में भी ख़तरे हैं हज़ार भूल जाता हूं हमेशा मैं संभल जाने के बाद अब ज़रा सा फ़ासला रख कर जलाता हूँ चराग़ तज्रबा   हाथ आया हाथ जल जाने के बाद एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम भेद यह मुझ पर खुला रस्ता बदल जाने के बाद वहशते दिल को बियाबाँ से तअल्लुक   है अजीब कोई घर लौटा नहीं , घर से निकल जाने के बाद              ***               2 हम पंछी हैं जी बहलाने आया करते हैं अक्सर मेरे ख़्वाब मुझे समझाया करते हैं तुम क्यूँ उनकी याद में बैठे रोते रहते हो आने-जाने वाले , आते-जाते रहते है...

मैं और गद्य लेखन

आज से सोचा वो करूँ जो पिछले कई दशकों से सोचता आया कि करूँ लेकिन कर नहीं पाया. यानी कि कुछ गद्य लेखन यानी कहानी और उपन्यास को अपने अंजाम तक पहुँचाना. बक़ौल साहिर लुधियानवी अंजाम तक पहुँचा नहीं पानेवाले उन अफ़सानों को ‘ख़ूबसूरत मोड़’ देकर भी छोड़ नहीं पाया या शरतचन्द्र के पिता मोतीलाल की तरह कोई भी रचनात्मक कार्य शुरू करने के बाद बीच में ही छोड़ दिया. हालाँकि मैं उन नाविकों की क़द्र करता हूँ जो बीच दरिया में ही कश्ती डुबोने की जुर्रत करते आए हैं. फिर भी शर्मन-लिहाजन लगता है जीवन भर की इसकाहिली के इतिहास पर एकाध नॉवेल और कहानी-संग्रह पूराकर एक सवालिया निशान छोड़ जाऊँ. अब अपने पक्ष में कोई तर्क पेश करना या कई तरह के बहाने पेश करना भी थोड़ा ठीक नहीं लगता. वैसे चाहूँ तो बहुत सारी शहादतें पेश कर सकता हूँ अपनी बेगुनाही को साबित करने के लिए जैसे कि वक़्त की कमी, ज़िन्दगी भर अपना और अपनों का पेट पालने के लिए किसी न किसी काम में लगा रहना जिसका अदब और सकाफ़त से कोसों दूर का वास्ता नहीं था, फिर जिस्मानी तौर पर थक जाना या माहौल, प्रोज राइटिंग के लिए सही माहौल नहीं मिल पाना, कई वजूहात हैं जो अदब और साहित्य को ...

कमलेश की कहानी-- प्रेम अगिन में

  कमलेश            प्रेम अगिन में   टन-टन-टन। घंटी की आवाज से तंद्रा टूटी छोटन तिवारी की। बाप रे। शाम में मंदिर में आरती शुरू हो गई और उन्हें पता भी नहीं चला। तीन घंटे कैसे कट गये। अब तो दोनों जगह मार पड़ने की पूरी आशंका। गुरुजी पहले तो घर पर बतायेंगे कि छोटन तिवारी दोपहर के बाद मंदिर आये ही नहीं। मतलब घर पहुंचते ही बाबूजी का पहला सवाल- दोपहर के बाद मंदिर से कहां गायब हो गया ? इसके बाद जो भी हाथ में मिलेगा उससे जमकर थुराई। फिर कल जब वह मंदिर पहुंचेंगे तो गुरुजी कुटम्मस करेंगे। कोई बात नहीं। मार खायेंगे तो खायेंगे लेकिन आज का आनन्द हाथ से कैसे जाने देते। एक बजे वह यहां आये थे और शाम के चार बज गये। लेकिन लग यही रहा था कि वह थोड़ी ही देर पहले तो आये थे। वह तो मानो दूसरे ही लोक में थे। पंचायत भवन की खिड़की के उस पार का दृश्य देखने के लिए तो उन्होंने कितने दिन इंतजार किया। पूरे खरमास एक-एक दिन गिना। लगन आया तो लगा जैसे उनकी ही शादी होने वाली हो। इसे ऐसे ही कैसे छोड़ देते। पंचायत भवन में ही ठहरती है गांव आने वाली कोई भी बारात और इसी...