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दहक  उठेगा ये गुलमोहर फिर 

मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त 
के हम फ़साना गढ़ लें 
मैं जानता हूँ अभी न आया है 
ऐसा मौसम 
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है 
जहाँ को उससे निजात दे  दें
अभी तो दौर है वो 
के शीर को भी तरसते बच्चों   
को जब भी चाहा हलाक कर दें 
अभी तो इन्सां छुपा हुआ है 
अभी तो हैवाँ मचल रहा है 

मैं जानता हूँ अभी नहीं है 
वो वक़्त के हम 
कुछ ऐसे दोपहर में 
किसी शजर के ज़रा-सा साया 
के मुन्तज़िर हों 
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं 

हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे 
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं 
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का 
के इंसानियत की वुसअतों को 
बस एक नुक्ते-भर की 
जगह अता हो 

जहाँ से राजा निकल रहा है 
वहाँ पे है सरनिगूं  रियाया 
वहाँ बनाई गयी हैं  देखो 
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ 
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू 
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों 
के नारे कितने मचल रहे हैं 
जिन्हें किसी ने कभी न देखा 
के सारे अखबार,हरूफ़ उनके 
के जितने भी कैमरे मयस्सर 
सब इक जगह पे अटक गए हैं 

मैं जानता हूँ अभी नहीं है 
वो वक़्त के हम 
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें 
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में 
मगर इसी गर्म-सी हवा में 
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे 
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी 
गुलों में शोला दहक रहा है  

मताला कर लो जो गुलमोहर का 
किसी मुक़द्दस किताब जैसा 
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे 
के वक़्त का ही फेर है यह 
ज़रूर लेगा ये एक करवट 
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर 

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